Sunday, 11 September 2022

माँ नवदुर्गा के 9 अवतारों का वर्णन Maa Durga Stories in Hindi


Navdurga


माँ नवदुर्गा के 9 अवतारों का वर्णन Maa Durga Stories in Hindi

 सनातन धर्म में नवदुर्गा माता दुर्गा के नौ रूपों को ही माना जाता है। नव दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग-अलग वाहन हैं, अस्त्र, शस्त्र हैं परन्तु यह सभी एक हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

+ नवदुर्गा के नौ रूप का वर्णन +

शैलपुत्री

1-शैलपुत्री-

पहले स्वरूप में दुर्गाजी 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने पर इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। यही देवी सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

                                                                मन्त्र:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

 

 एक बार की बात है जब सती के पिता प्रजापति दक्ष जी ने यज्ञ का आयोजन किया तो इसमें सारे देवी देवताओं को निमन्त्रित किया गया, परंतु अपने दामाद भगवान शिव को नहीं निमन्त्रित किया । परंतु सती जी अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमन्त्रित किया गया है, लेकिन हमे नहीं आया है । ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं रहेगा । परन्तु माता सती सन्तुष्ट नहीं हुईं।

सती जी के बार बार आग्रह करने पर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुँचीं तो सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुँचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपनेआप को जलाकर भस्म कर लिया।

शंकर भगवान ने इस दारुण दुख से व्यथित होकर ताण्डव करते हुये उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी फिर से भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिव की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनन्त है, इनकी महिमा अप्रम्पार है.

दूसरे नाम : वृषारूढ़ा, हेमवती, सती, पार्वती, और भवानी भी इन्हि देवी के अन्य नाम हैं।


ब्रह्मचारिणी

2-ब्रह्मचारिणी

दूसरी माँ ब्रह्मचारिणी जी है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया। कहते है माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।

मन्त्र:

दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला-कमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

 

पूर्वजन्म में मा ने हिमालय के घर में जन्म लिया था और नारदजी के कह्ने से भगवान शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। फल-फूल खाकर मा ने एक हजार वर्ष बिताए और सौ वर्षों तक जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।

कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप मे बहुत कष्ट सहे। कई वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा "हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही सम्भव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चन्द्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे।


चन्द्रघण्टा

3-चन्द्रघण्टा

तीसरी शक्ति का नाम मा चंद्रघंटा है। नवरात्रि में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं का विग्रह पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रवेश करता है। इस देवी की क्रपा से दिव्य सुगन्धियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियाँ सुनाई देने लगती हैं। यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरन्तर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र है। इसीलिए इस देवी को चन्द्रघण्टा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी मा के दस हाथ हैं। वे खडग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं।

इसके घण्टे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं। सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियाँ सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए।

मन्त्र:

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥


कूष्माण्डा

4-कूष्माण्डा

चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। जब साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है। अपनी हल्की हँसी के द्वारा ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्माण्डा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार था, तब इसी देवी ने अपने हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।

देवी मा की आठ भुजाएँ हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाती है । इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है,  वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृत में कुम्हड़े को कुष्माण्ड कहते हैं।

इनका वास सूर्यमण्डल लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कान्ति और प्रभा सूर्य की भाँति ही दैदीप्यमान है। इनके तेज से दसों दिशाएँ आलोकित हैं। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है। अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इसकी क्रपा से भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।

मन्त्र:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥


स्कंदमाता

5-स्कंदमाता

पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। देवी मा की चार भुजाएँ हैं। यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है।

पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कन्दमाता। नवरात्रि में पाँचवें दिन देवी मा की पूजा-अर्चना की जाती है। इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कन्द कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कन्दमाता नाम से पुकारा जाता है।  इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कान्तिमय हो जाता है। अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।

मा की पूजा से मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं। कहते हैं कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएँ स्कन्दमाता की कृपा से ही संभव हुईं।

मन्त्र:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

 

कात्यायनी

6-कात्यायनी

छठे स्वरूप का नाम माँ कात्यायनी है। इस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी उपासना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है और रोग, शोक, संताप और भय आदि नष्ट हो जाते हैं। कई जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

कात्य गोत्र मे विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां  ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। यह वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट हुयी और उनकी पूजा की जा रही है. माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिन्दी यमुना के तट पर की गई थी।

यह ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका स्वरूप अत्यन्त दिव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाले हाथ मे अभयमुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ में वर मुद्रा। माँ के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।

इनकी उपासना और आराधना से भक्तों के जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

मन्त्र:

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥

 

कालरात्रि

7-कालरात्रि

माँ की सातवीं शक्ति को कालरात्रि के नाम से जानते हैं। सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है तथा ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगते है और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भाग जाती हैं।

माँ दुर्गा जिनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। काल से भी रक्षा करने वाली शक्ति है।

देवी जी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्माण्ड के समान गोल हैं। इनकी साँसों से अग्नि निकलती है। ऊपर के दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहते है ।

बायीं तरफ ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली हैं। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।

इनकी उपासना से ब्रह्माण्ड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुल जाते हैं और सभी असुरी शक्तियाँ उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भाग जाती हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और जल, जन्तु,अग्नि, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

मन्त्र:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥


महागौरी

8-महागौरी

माँ की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। आठवें दिन महागौरी माँ की उपासना का विधान है। नवरात्रि में आठवें दिन महागौरी शक्ति रूप की पूजा की जाती है। नाम के आधार पर पता चलता है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से दी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकि चार भुजाएँ हैं और वाहन वृषभ है। इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुए है। ऊपर वाले बाएँ हाथ में डमरू है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शान्त है।

मन्त्र:

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥ 


सिद्धिदात्री

9-सिद्धिदात्री

माँ की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। माना जाता है कि इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प शुसोभित होता है, इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प आसीन हैं। नवरात्र की यह अन्तिम देवी माँ हैं। हिमाचल के नन्दापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है। यह देवी सर्व सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं। भक्त पर इनकी कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से संभव हो जाते हैं। इनके पास अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियाँ हैं। देवी की सच्चे मन से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। देवी की कृपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर के नाम से भी जानते है। नौंवे दिन विधि-विधान से इस देवी की उपासना करने से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरन्तर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं ।

सिद्धिदात्री का मन्त्र:

सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।


माँ नव दुर्गा  के नाम व उनका महत्व-

 शैलपुत्री- यह माँ का पहला स्वरूप हैं पत्थर, मिट्टी, जल, वायु, अग्नि, आकाश सब शैल पुत्री के प्रथम रूप हैं।                    ब्रह्मचारिणी - माँ जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती माँ का दूसरा रूप है।                                                                चन्द्रघण्टा – यह माँ भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में वाणी है।         कूष्माण्डा - माँ अण्डे को धारण करने वाली; स्त्री  की गर्भाधान शक्ति है वो माँ की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में  देखा जा   सकता है।                                                                                                                                                                                    स्कन्दमाता - पुत्रवती माँ माता-पिता का स्वरूप है प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता स्कन्द माता के रूप हैं।                                कात्यायनी- माँ के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता हैं। यह देवी माँ का छठा स्वरुप है।                                         कालरात्रि-यह देवी माँ भगवती का सातवां रूप है जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सभी को इस स्वरूप का अनुभव होता है। भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ हो सकते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप देखना सरल नहीं है।                                                                                                                                                     भगवती माँ का आठवाँ स्वरूप महागौरी गौर रंग का है।                                                                                                                  माँ भगवती का नौंवा रूप सिद्धिदात्री है। यह ज्ञान अथवा बोध का प्रतीक है, जिसे जन्म जन्मान्तर की साधना से पाया जा सकता है। इसे प्राप्त कर साधक परम सिद्ध प्राप्त हो जाता है। इसलिए इसे सिद्धिदात्री कहते है।

 




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